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सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

एक ख़त -पारिवारिक विघटन की और बढ़ते जा रहे दरकते रिश्तों के नाम

गूंध के नर्म आटे में प्याज के चंद टुकड़े
मैंने खुश्बू वाली दो रोटियां बनाई है
इक तेरे  लिए बनाई है इक अपने लिए बनाई है
हाँ!साथ बैठ के खाने को ये दो रोटियां बनाई है
दोस्तों !
ज़िन्दगी में सिर्फ और सिर्फ प्यार ही एक ऐसा सच है जिसके आगे दुनिया की सारी दौलत फीकी पड़ जाती है.अपने प्यार के साथ जीना बेहद खुशगवार एहसास है इसे सहेज के सवार के रखो.इसे ज़िन्दगी भर की कसक मत बनने दो.
कहते है हमसफ़र को उसकी सारी अच्छाईयों और बुराइयों के साथ कबूल करना चाहिए ये सच भी है पर समझदार सोच ये है कि  कितना ही अच्छा हो अगर हम अपनी अच्छाइयों से उसे उसकी बुराइयों से दूर कर सकने में सफलता पा सके ये कोई मुश्किल काम नही है .
ये जिस्म मिला है अच्छा काम करने के लिए ताकि जब वो परमात्मा के पास पहुचे तो शर्मिंदा ना हो मनुष्य को सिर्फ यही कामना
करनी चाहिए कि हे प्रभु मुझसे कोई गलत काम ना हो ताकि में आपके पास सुख और शांति से आ सकूँ .
ये सुख और शांति  क्या है ?
ये सुख है दूसरो को ख़ुशी देना
शांति है उसकी ख़ुशी में खुश होना !
ये तभी संभव है जब हम अपनापन रखे.कहीं कुछ गलत हो गया हो या हो रहा हो तो धैर्य और प्यार के साथ उसे ठीक करने कि कोशिश करे .अब सारी दुनिया तो हम सही नहीं कर सकते पर अपने इर्द गिर्द तो ऐसा वातावरण बना सकते हैं जहाँ प्यार कि खुश्बू हो,सुरक्षा का एहसास हो, अच्छी बातें हो अच्छे संस्कार हो. इसके लिए अच्छे विचार सुन्दर अभिव्यक्ति और संतुलित व्यवहार ये तीन मंत्र हैं .इन तीनो मंत्र का एक ही शत्रु हैं क्रोध .सबसे पहले क्रोध का नाश करना ज़रूरी है.ये अच्छे विचार को हमारे पास फटकने नहीं देते .हमारे अच्छे विचार भी गलत भाषा के प्रयोग से बहुत ही असभ्य और असंतुलित हो जाते है.सभ्य आचरण से हम जहाँ बहुत सी दुविधाओ को ख़त्म कर सकते हैं.वही असभ्य आचरण से बहुत सारी दुविधाओ को जन्म देते है.इसलिए क्रोध का नाश करने को एक आवश्यक अभ्यास कि तरह अपने जीवन में अपनाना चाहिए.


हमारे शरीर के सभी अंग बहुत संवेदनशील है,मगर हाथ और जीभ दो अंग ऐसे होते हैं जो अच्छाई ,बुराई दोनों को पराकाष्ठा तक पहुचाने का काम करते हैं.हाथ का नियंत्रण बहुत जरुरी है.ये हमारे समग्र विचारो को कार्यरूप देता है.हम अच्छे विचार रखेंगे तो ये हाथ अच्छे कामो में हमारा साथ देंगे.हम बुरे विचार रखेंगे तो इन हाथों से गलत और असभ्य कार्य ही होंगे.परमात्मा ने संपूर्ण सृष्टि में सिर्फ और सिर्फ मनुष्य की जात ही ऐसी बनाई है जिसे सोचने समझने की शक्ति,बुद्दि दी है इसलिए इसका सही इस्तमाल कर हम इन्ही हाथों से स्वकल्याण ,जनकल्याण और विश्व कल्याण कर सकते हैं.
जीभ का इस्तेमाल हमारे पूरे व्यक्तित्व को प्रतिविम्बित करता है.बहुत आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक ज़बान के गलत प्रयोग से जहाँ अपना पूरा सम्मान पल भर में खो देता है वहीं साधारण से साधारण व्यक्तित्व का मालिक सुसंस्कृत और सभ्य भाषा से पूरे समाज में सम्मान का पात्र बनता है.इसलिए इसको इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतना ज़रूरी है .ये जीभ ही है जो राजसिहासन पर बिठाती  है और ये जीभ ही है जो राजसिंहासन से उतारती है .
हर रिश्ते में विश्वास का होना बहुत ज़रूरी है.किसी भी एक रिश्ते में जब यह विश्वास खंडित होता है तो बहुत सारे रिश्ते इससे प्रभावित होते है.इसके विपरीत एक रिश्ते में जब यह पुख्ता (मज़बूत )होता है तो बहुत सारे रिश्ते खुद बा खुद मज़बूत हो जाते है.जो बीत गया सो बीत गया.अतीत के पन्नो को पलटने के बजाय आने वाले कल के लिए अगर हम खूबसूरत ,नर्म कालीन बिछाएं तो सफ़र कितना सुखद होगा है ये हमारी समझदारी पर निर्भर करता है.अतीत का वो कोई भी पन्ना जो दुःख दे सकता है उसे हमेशा के लिए अपनी ज़िन्दगी से उखाड़ फेकना चाहिए, कभी भूल कर भी उसपर चर्चा नहीं करनी चाहिए.
हम जिसका स्मरण बार बार करते है हमारे इर्द गिर्द का वायुमंडल उसी से प्रभावित होता है हम बार बार दुखद बातों को याद करेंगे तो हमारा परिवेश उतना ही भारी होगा.दुःख हमेशा भारी होता है.ये हमारे पूरे व्यक्तित्व को पैरों तले कुचल देता है.सुख हल्का होता है इससे हमारे सारे संताप झर जाते है.इसलिए हमेशा अपने इर्द गिर्द खुशनुमा ,प्रबुद्ध ,ज्ञानवान,प्रकाशमान माहौल बनाकर रखने का प्रयास करना चाहिए.
कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता है.जब हम अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होते है तो किसी को उसकी किसी कमी के लिए दण्डित करने का हमें कोई अधिकार नहीं है.इसके लिए एक शब्द है क्षमा  .हर इंसान अपने अच्छे और बुरे कृत्य के लिए स्वयं ही जिम्मेदार होता है.उसको उसके हर अच्छे और बुरे कृत्य का भुगतान करना ही होता पड़ता है.इसीलिए किसी को भी अपमानित करने, दण्डित करने से कही ज्यादा बेहतर है क्षमा  करना और सही राह दिखाना.बाकी जैसा कर्म वैसा भाग्य .इसीलिए हमेशा सत्कर्म करना चाहिए और प्रेरित करना चाहिए.
सम्मान हर रिश्ते की रीढ़ की हड्डी होती है,गुरु शिष्य ,भाई बहन,पति पत्नि ,माता पिता और उनकी संतान ,दोस्ती,छोटे बड़े हर रिश्ते में सम्मान की जरुरत होती है.जहाँ भी इनमें थोड़ी सी भी कमी होती है वहां रिश्ता रेत के महल सा ढ़हने लगता है.ख़ास बात ये होती है कि ये एकतरफा संभव नहीं है.इसके साथ Give and Take की फिलोसोफी लागू होती है.इसलिए हर इंसान को हर रिश्ते को सम्मान देना आना चाहिए.
बिलकुल साधारण सी बात है.एक छोटे बच्चे को प्यार और सम्मान देकर,हम उससे पूरी ज़िन्दगी ,आदर सम्मान पाने की जमीन तैयार कर सकते है.हम क्या पाते है यह हमारे व्यवहार पर निर्भर करता है.















4 टिप्‍पणियां:

  1. सम्मान हर रिश्ते की रीढ़ की हड्डी होती है..सौ प्रतिशत सहमत!! अच्छा आलेख.

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  2. shobha ji,sameer saheb,aur susheela ji bahut bahut dhanyawaad samay nikalkar meri rachna padhne ke liye.

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