रखदो चटके शीशे के आगे मन का कोई खूबसूरत कोना ,यह कोना हर एक टुकड़े में नज़र आये गा |

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बुधवार, 12 मई 2010

मोर का पंख



तुम्हे किताबों की शक्ल में पढ़ते पढ़ते 
न जाने कब मै उसमे रक्खा 
मोर का पंख हो गई
ये क्या गजब 
बात हो गई.

4 टिप्‍पणियां:

  1. क्या कहें की आपका मोर पंख हों जाना कविता को सतरंगा कर गया है . बधाई इस छोटी सी खूबसूरत रचना के लिए !!

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  2. तुम्हे किताबों की शक्ल में पढ़ते पढ़ते
    न जाने कब मै उसमे रक्खा
    मोर का पंख हो गई
    ये क्या गजब
    बात हो गई.

    वाह...वाह .....गज़ब का लिखा आपने ......
    बस नीचे की दो पंक्तियाँ बदल दीजिये ...
    यूँ कर दें ....?

    तुम सहेज लेना इन पंखों को
    मैं अमावस से ....
    पूनम की रात हो गई ......

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  3. bilkul kr de
    tum shej lena in pnkhon ko
    main amavs se
    poonam ki rat ho gai
    thank you kirat
    thank you very very much .

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