रखदो चटके शीशे के आगे मन का कोई खूबसूरत कोना ,यह कोना हर एक टुकड़े में नज़र आये गा |

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मंगलवार, 31 अगस्त 2010

सन्दूकची



जिन्दगी के बहुत सारे फलसफों को 
अंगूठियों की तरह अँगुलियों में पहनती हूँ , 
वक्त बे वक्त उनकी जगहों में रद्दोबदल करती हूँ 
मगर मुझे मनमुआफिक नतीजा नही मिलता | 
इसी जद्दो जहद में मेरी सन्दूकची में 
ढेर सारी अंगूठियाँ पनाह पा गई हैं | 

मेरे जाने के बाद वो सन्दूकची उनकी कब्रगाह बन जाएगी 
यकायक इस ख्याल ने मुझे रुआसा  कर दिया 
और मैंने सारी अंगूठियाँ समन्दर में बहा दीं 
मगर ये क्या ? 
समन्दर के सीने में गोते लगा कर 
वो अंगूठियाँ वापसी लहरों के साथ 
फिर मेरे कदमों को चूमने लगीं | 
मेरी आँखों के कोर भींग गये | 

मैंने एक एक कर चुन कर उन अंगूठियों में लगी 
सुनहरी बालू को पोछा तो देखा , 
कुछ सुनहरे कणों को उन अंगूठियों ने अपना लिया था 
ठीक उसी तरह जिस तरह सन्दूकची ने उन्हें 
और मैंने सन्दूकची को अपना लिया है अब 
ता उम्र के लिए | 

18 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी स्मृतियों की संदूकची मे आपने खुद ही को बंद कर दिया !!!!!

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  2. bahut hi sunder rachana......
    padhkar bahut hi achha laga....
    khaskar yeh panktiyan to kamal hain....
    ----------------------------------------
    मैंने एक एक कर चुन कर उन अंगूठियों में लगी
    सुनहरी बालू को पोछा तो देखा ,
    कुछ सुनहरे कणों को उन अंगूठियों ने अपना लिया

    उत्तर देंहटाएं
  3. स्मृतियाँ ही तो निकलती हैं, सन्दूक से।

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  4. RAJWANT RAJ ji..... Your post is really very touching and very impressive.

    Congratulations.

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  5. ठीक उसी तरह जिस तरह सन्दूकची ने उन्हें
    और मैंने सन्दूकची को अपना लिया है अब
    ता उम्र के लिए |
    फलसफों को अंगूठी की तरह पहनना ...खूबसूरत बिम्ब है ...अच्छी रचना ..

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  6. सच कहूं तो कल.... नहीं परसों भी यहाँ आया था!
    कविता पढ़ी... और चुपचाप चला गया!
    आप एक अन्य और ऊंचे मकाम पर हैं....
    खुदा और परवाज़ दे!
    आशीष

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  7. बेहतरीन प्रस्तुति!
    टिप्पणी के लिए बहुत धन्यवाद इसी तरह अपना स्नेह बनाए रखियेगा!
    मुझे आप जैसो के मार्गदर्शन कि ज़रूरत है!

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  8. waah kya baat kahi...sunder prateek chuna hai aur urdu lafzo ka istemaal bahut khoobsurti se kiya he.

    deri ke liye maafi chaahti hun.

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  9. mitro
    aap sbhi ko mere khvabo me bsi sndookchi psnd aai aabhari hu .bhut jld mulakat hogi shayd aaj hi .

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  10. Wah, wah!....kitni sundar kalpana!...yaade bhi kya aisi hi hoti hai?....taa umra apnaane ke liye!

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  11. कुछ सुनहरे कणों को उन अंगूठियों ने अपना लिया था
    ठीक उसी तरह जिस तरह सन्दूकची ने उन्हें
    और मैंने सन्दूकची को अपना लिया है अब
    ता उम्र के लिए |
    rराजवन्त जी जीने के लिये यही एक तरीका है। बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना। शुभकामनायें मेर ब्लाग्यहाँ भी देखें
    www,veerbahuti.blogspot.com
    dhanyavaad

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  12. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 7- 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  13. aadarniya rajwant ji,aapka comment mila,shukriya,,,
    isi blog par anya 2 rachnao ko bhi pdhe,,isi vinti ke saath BHARAT SINGH CHARAN nadaanummidien ki taraf se

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  14. बहुत सुन्दर प्रस्तुति …………………।बड़ा ही सजीव चित्रण किया है………………ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया ही बदल दिया

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  15. बेहतरीन...स्मृतियाँ कैद हो गई संदूकची में..

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  16. ये ज़िंदगी के फ़लसफ़े जिंदगी के साथ ही ख़त्म होते हैं ... बर्ना साथ चलते रहते हैं .... बहुत गहरी सोच का परिणाम है लाजवाब रचना ...

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  17. मगर ये क्या ?
    समन्दर के सीने में गोते लगा कर
    वो अंगूठियाँ वापसी लहरों के साथ
    फिर मेरे कदमों को चूमने लगीं |
    मेरी आँखों के कोर भींग गये |
    --
    बहुत ही हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति है!

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  18. कुछ सुनहरे कणों को उन अंगूठियों ने अपना लिया था
    ठीक उसी तरह जिस तरह सन्दूकची ने उन्हें
    और मैंने सन्दूकची को अपना लिया है अब
    ता उम्र के लिए
    नया अंदाज़ और नया आयाम अच्छा लगा

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