रखदो चटके शीशे के आगे मन का कोई खूबसूरत कोना ,यह कोना हर एक टुकड़े में नज़र आये गा |

यह ब्लॉग खोजें

बुधवार, 15 सितंबर 2010

खारिज


मैंने सपने में भी
 दंश को चुभने की इजाजत न दी 
और तुमने मुझे
 सरेराह छलनी कर दिया ,
अब कहते हो , मुझे माफ़ करो | 


सम्बोधन की दुहाई दे कर 
आत्मा को पी जाने वाले 
हे काठ पुरुष  ! 
तुम्हे तरलता , सरलता से क्या सरोकार ? 
तुम्हे तुम्हारी निजता प्यारी है 
फिर ये सेंधमारी क्यों ? 


तुम सूखे हुए, जल का ,एक दाग हो 
जिसे गीले  कपड़े  से पोछ के छुड़ाना है | 
तुम चाहते हो , तुम्हे मेरी अपनी सम्वेदनाओं की तह तक 
पहुचाने के लिए 
मुझे मेरे अपने ही मरुस्थल से गुजरना पड़े | 
ये कैसी शर्त है ? 
जाओ ,चले जाओ | 


  अब मै अपनी छाती में 
बारिश की बूंदें भरुंगी | 
एक महासागर बनाउंगी 
और अपने मरुस्थल में 
एक पौधा भी रोपूंगी
जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ | 
जाओ जाओ ! 
इसी पल से मै तुम्हे अपने मरुस्थल से मुक्त करती हूँ ,
जाओ ! तुम्हे सिरे से खारिज करती हूँ |  

37 टिप्‍पणियां:

  1. तुम चाहते हो , तुम्हे मेरी अपनी सम्वेदनाओं की तह तक
    पहुचाने के लिए
    मुझे मेरे अपने ही मरुस्थल से गुजरना पड़े |

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ...और मरुस्थल से मुक्त करना ...गज़ब की सोच है ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. मैंने सपने में भी
    दंश को चुभने की इजाजत न दी
    और तुमने मुझे
    सरेराह छलनी कर दिया ,
    अब कहते हो , मुझे माफ़ करो |
    वाह क्या बात है, बहुत सुंदर ,धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब मै अपनी छाती में
    बारिश की बूंदें भरुंगी |
    एक महासागर बनाउंगी
    और अपने मरुस्थल में
    एक पौधा भी रोपूंगी
    जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ |
    जाओ जाओ !
    लाजवाब ,गहरी सोच

    उत्तर देंहटाएं
  4. खरे शब्दों में छोड़ देने का आदेश।

    उत्तर देंहटाएं
  5. कमाल की अभिव्यक्ति है!
    --
    बधाई!
    --
    दो दिनों तक नेट खराब रहा! आज कुछ ठीक है।
    शाम तक सबके यहाँ हाजिरी लगाने का

    उत्तर देंहटाएं
  6. भावपूर्ण कविता ....
    पढ़कर बहुत अच्छा लगा ..
    आभार ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. अरे अरे अरे.....इतना गुस्सा ??? वो भी आपमें ?

    डर रही हूँ मैं तो...

    लेकिन जो भी लिखा इतना धमाकेदार लिखा की सच डर लग रहा है. :)
    और जो आपके कोप का भाजन बनेगा उसका क्या होगा ??? :)

    सुंदर अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बिल्कुल मै भी अनामिका जी की तरह ही सोच रही हूँ .... क्या होगा उस बेचारे का ? :)

    उत्तर देंहटाएं
  9. अब मै अपनी छाती में
    बारिश की बूंदें भरुंगी |
    एक महासागर बनाउंगी
    और अपने मरुस्थल में
    एक पौधा भी रोपूंगी
    जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ |
    जाओ जाओ !
    इसी पल से मै तुम्हे अपने मरुस्थल से मुक्त करती हूँ ,

    अपने मरुस्थल को नखलिस्तान हम ही बनाएं और अवांछित को उधर फटकने भी न दें।
    एक स्पष्ट और आत्म गौरव से भरी हुंकार।
    स्वागत।
    या यूं कहूं ‘यलगार ’,
    अन्य शब्दो में प्रयाण करो। सफलता आपकी है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. aadrneey mitro
    is post ko blog pr dalne ke chnd minto ke bad mai lucknow se bahr chli gai thi . panch dino bad wapis aakr sbse phle aap sbhi se milne ke liye computer khola . aap sbhi se mil kr bhut khushi hui .dil se shukrita .
    is kvita me mera aakrosh na to smpoorn purush jati ke liye hai na hi vykti vishesh ke liye hai.
    ye aawaj smaj me faile anachar ke khilaf ourat jati ka ek aahvahn hai jo shbdbddh ho kr meri kvita me utr aaya hai . kisi vykti vishesh ko drne ki koi jrurat nhi hai .is trh ki vichardharao ko smrthn mile our hmari abodh nariya hosh me aaye our apni asmita ke prti smvednsheel evm jagrook ho bs yhi is chhote se pryas ki mang hai .
    mere blog pe pdharne ke liye ek bar fir aap sbhi ka bhut bhut shukriya .

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर ढंग से शब्दों में सजी कंटक व्यथा और उसका वर्णन
    बधाई
    आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  12. तुम सूखे हुए, जल का ,एक दाग हो
    जिसे गीले कपड़े से पोछ के छुड़ाना है | !!

    वाह !दर्द के साथ निराशा हुआ करती थी !
    ये तुम हो खिले गुलाब पर जल की बूंदों की तरह
    आशा का संदेशा देती हुईं !उम्मीद का तोहफा देती हुई
    जीवन का राग बिखेरती ! बधाइयाँ

    उत्तर देंहटाएं
  13. rajwant didi.
    maafi chahunga pichhle kai dinon se blog se kata raha.
    aate hi aapki tippani ne himmat diya aur aapke blog par aakar to dang rah gaya ki aap gambhir lekhni me zabarzast mahir hayn.aap chha gaye didi.
    likte rahiye ham sabhi padhne walon ke liye plz.

    उत्तर देंहटाएं
  14. rajvant g aapke liye ek comment kiya hai apne blog par..kya ek bar aur aa ksati hai ?


    mer ek kavit bilkul isi mizaz kee hai ...izazat ho to email karoon ?

    उत्तर देंहटाएं
  15. jroor ramkumar ji ,
    bhavna ka roop nhi bdlta hai shilp alag alag hote hai isliye aapki kvita ka sdaiv swagt rhega .
    aasha ji usha ji our arshad bhai shukr hai aapke drshan huye vrna soch rhi thi ki pulice me riport likha du . aate rha kro yu hi thlte thlte.

    उत्तर देंहटाएं
  16. .

    Rajwant ji,

    जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ |
    जाओ जाओ !
    इसी पल से मै तुम्हे अपने मरुस्थल से मुक्त करती हूँ ,
    जाओ ! तुम्हे सिरे से खारिज करती हूँ |

    I have never read such a beautiful creation in my life , so far.

    The poem reflects your inner strength.

    I am proud of Rajwant ji.

    Hats off to you for such an honest creation !

    Love you.
    Divya

    .

    उत्तर देंहटाएं
  17. मैंने सपने में भी
    दंश को चुभने की इजाजत न दी
    और तुमने मुझे
    सरेराह छलनी कर दिया ,
    अब कहते हो , मुझे माफ़ करो |
    waah laazwaab rachna hai .

    उत्तर देंहटाएं
  18. itna zabradast gussa darshaata hai k pyaar bhi itna hi zabardast hoga....
    vaise pyar aur nafrat ek hi sikke ke do pahlu hain....

    उत्तर देंहटाएं
  19. ha veer ji
    har bhavna ke sath emandari apekchhit hai our mai is drshn me poora poora vishvas krti hun .vaise mere sikke ke dono phlu me sari duniya ke liye pyar hi pyar hai , ha aakrosh ho skta hai mgr meri fitrat hi kuchh aisi hai ki mai kisi se bhi nfrat kr hi nhi skti . meri is kvita kharij me bhi aakroosh hai jo nkarta hai , kharij krta hai magar nfrat ! vo to kar hi nhi skta .

    aap bhut dino ke bad blog pr aaye aabhari hun . thanks.prtiman ki unnti ke liye shubhkamnayen .

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत ही खुबसूरत रचना...अपनी कलम का जादू यूँ ही बनाये रखें..

    मेरे ब्लॉग पर मेरी नयी कविता संघर्ष

    उत्तर देंहटाएं
  21. अब मै अपनी छाती में
    बारिश की बूंदें भरुंगी |
    एक महासागर बनाउंगी
    और अपने मरुस्थल में
    एक पौधा भी रोपूंगी
    जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ |
    जाओ जाओ !
    .....Dard kee intah hone kee dasha mein ulahana deti ek dardbhari ukti.....
    bahut garhre bhav ...
    Shubhkaamnayne

    उत्तर देंहटाएं
  22. राजवंत जी,
    नमस्ते!
    आक्रोश! क्रोध!
    क्यूँ? किसलिए?
    आशीष

    उत्तर देंहटाएं
  23. अब मै अपनी छाती में
    बारिश की बूंदें भरुंगी |
    एक महासागर बनाउंगी
    और अपने मरुस्थल में
    एक पौधा भी रोपूंगी
    जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ |
    जाओ जाओ !bahut hi sundar rachna hai .

    उत्तर देंहटाएं
  24. अब मै अपनी छाती में
    बारिश की बूंदें भरुंगी |
    एक महासागर बनाउंगी
    और अपने मरुस्थल में
    एक पौधा भी रोपूंगी
    जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ |

    aaj tak jo koi aurat nahi keh paayi aapne wo keh diye ... bahut khoob

    aapne mere blog par darshan diye uske liye bhi shukriya ...

    उत्तर देंहटाएं
  25. aap sbhi ka apne blog pr hardik abhinndan krte huye aabhari hu . isi trha hausla afjai krte rhiye, mai wada krti hu sahity ke bhut sare phluo pe vichar vimarsh hoga .
    ashish ji , anamika ji our susheela ji ,
    meri kvita kharij bhut thnde dimag se upji glt mansikta ke prti meri bhavnaye bhr hai .ha mai ye jroor chahti hu ki smaj me sahity ke madhym se chetna ka prvah hota rhe our isme meri thodi si bhi bhagedari ho ski to mai apne ko khushkismat smjhungi .
    thanks

    उत्तर देंहटाएं
  26. मैंने सपने में भी
    दंश को चुभने की इजाजत न दी
    और तुमने मुझे
    सरेराह छलनी कर दिया ,
    अब कहते हो , मुझे माफ़ करो ....

    हिला दिया इन पंक्तियों के दर्द ने .... इनमें छिपे रोष ने ....
    असल जीवन के बहुत करीब से लिखी है आपने ये रचना ... आस पास बिखरी हुई कितनी ही सच्चाई मिल जाएगी ....
    सच है जो अंग जहर हो जाए उसे काट देना चाहिए ...

    उत्तर देंहटाएं
  27. rajwant didi maine aapka aadesh maan liya.maine post likha hay aap padh le to maza aa jaaye

    उत्तर देंहटाएं
  28. अब मै अपनी छाती में
    बारिश की बूंदें भरुंगी |
    एक महासागर बनाउंगी
    और अपने मरुस्थल में
    एक पौधा भी रोपूंगी
    जिसकी छाँव से तुम्हे अभी से वर्जित करती हूँ |
    Shandar aur prabhavshali----.

    उत्तर देंहटाएं
  29. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

    उत्तर देंहटाएं
  30. rajwant ji,namashkaar,,
    kuch likha hai,socha aapki raay mil jati to accha hota,,,pratiksha me

    उत्तर देंहटाएं
  31. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं