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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

सच

-
दूसरों के सुख के लिए अपनाये गये दुःख में 
एक नैसर्गिक सुख छिपा होता है | 
इस अपनाये गये दुःख को 
बर्दाश्त करने के लिए 
ईश्वरीय सत्ता को हर पल 
साक्षी बनाये रखना पड़ता है ,
उस सत्ता से सम्वाद स्थापित करना होता है ,
ईमानदार होना पड़ता है | 
अपने परिस्थितिजन्य कृत्य की पवित्रता और
सम्वेदनशीलता को बनाये रखना होता है | 
इन सबके उपर समय पर 
भरोसा करना पड़ता है और उसमे 
आत्मा की गहराई  तक 
आस्था का पुट मिलाना होता है | 
पृथ्वी और माँ से ज्यादा 
भला इस सच को और कौन महसूस कर सकता है 
जो अपने जीवन का अधिकांश 
इस सच के साथ गुजरती है कि  
 दूसरों के सुख के लिए अपनाये गये दुःख में 
एक नैसर्गिक सुख छिपा होता है | 

17 टिप्‍पणियां:

  1. आत्मा की गहराई तक
    आस्था का पुट मिलाना होता है

    सटीक ...सत्य वचन हैं ..अच्छी प्रस्तुति

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  2. वाह, क्या बात कही है !Great presentation..

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  3. दूसरों के सुख के लिए अपनाये गए दुःख .....????

    इस माँ का भार कौन चुका सकता है .....राज जी ....
    पर माँ की इन कुर्बानियों कद्र बिरले ही कर पाते हैं .....

    पृथ्वी और माँ से ज्यादा
    भला इस सच को और कौन महसूस कर सकता है
    जो अपने जीवन का अधिकांश
    इस सच के साथ गुजरती है

    बहुत सुंदर .....!!

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  4. पृथ्वी और माँ से ज्यादा
    भला इस सच को और कौन महसूस कर सकता है

    सच कहा आपने ...पृथ्वी और माँ का जीवन बस देने में बीत जाता है......

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  5. यही नैसर्गिक सुख अह्लाद दे जाता है।

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  6. दूसरों के सुख के लिए अपनाये गये दुःख में
    एक नैसर्गिक सुख छिपा होता है |

    बहुत ही सुन्‍दर बात कही है आपने ।

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  7. bahut sundar Didi..
    Aaj bahut dinon ke baad blog dekh raha hun..kuchh zayada bizi raha pichhle kuchh nahino se..magar ab apne blog pa milunga...

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  8. @ पृथ्वी और माँ से ज्यादा
    भला इस सच को और कौन महसूस कर सकता है

    आप की बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ, बधाई अच्छी कविता के लिए.

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  9. दूसरों के सुख के लिए अपनाये गये दुःख में
    एक नैसर्गिक सुख छिपा होता है |

    राजवंत जी सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बधाई और आभार.

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  10. पृथ्वी और माँ से ज्यादा
    भला इस सच को और कौन महसूस कर सकता है
    सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बधाई और आभार....

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  11. किसी दूसरे के सुख के लिए , अपनाए गए दुःख में भी एक अलौकिक सुख होता है ।

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  12. is prapt sukh me aseem shanti hai .vo bhut bhagyshali hote hai jo is prkriya se vabsta hote hai .
    aap sbhi ki is vichar se shmti se aatvishwaas our pukhta hota hai . sneh bnaye rkhe .
    dhnywaad .

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  13. दूसरों के सुख के लिए अपनाये गये दुःख में
    एक नैसर्गिक सुख छिपा होता है |!!!
    सच में यह बात धरती और एक माँ ही जानती है !और इसके सम्मान में ही सबका कल्याण है ! बहुत सुंदर है कविता

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  14. आदरणीया राजवंत राज जी
    सादर अभिवादन !

    सच है दूसरों के सुख के लिए अपनाये गये दुःख में
    एक नैसर्गिक सुख छिपा होता है


    … लेकिन मां और पृथ्वी तो दूसरे के भाव से ही मुक्त होती हैं …
    मां के लिए कौन बच्चा पराया … धरती का हर जीव धरती का अपना ! ( कोई कृतघ्न स्वयं पराया हो जाए … तब भी ! )

    नई रचना का इंतज़ार है …हार्दिक शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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