रखदो चटके शीशे के आगे मन का कोई खूबसूरत कोना ,यह कोना हर एक टुकड़े में नज़र आये गा |

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शुक्रवार, 10 जून 2011

हुसैन --श्रद्धांजलि


भावनाओं की जो अकूत सम्पदा 
उकेर गये हो कैनवास पर 
हे चित्रकार ! 
कौन कहता है तुम विलुप्त हो गए हो 
परिदृश्य से | 

तुम अपने सुकर्म से सकर्म
उपस्थित हो 
यहीं हो , यहीं कहीं हो | 

तुम्हारी अँगुलियों ने उकेरीं है जो 
 लाल , पीली , नीली , हरी लकीरें 
पूरी शिद्दत से अपने होने का 
दम भरती रहेंगी ताउम्र   
ये बात अलग है 
कि उन्हें तराशने वालेतुम्हारे  हाथ
 अब कभी न थिरकेंगे | 

न मिले , कोई गिला नही इन लकीरों को 
अर्थ युक्त भरपूर जिन्दगी जी है इन्होंने तुम्हारे साथ | 

आने वाले वक्त में 
ये लकीरें रहबर बनेंगीं 
तराशेंगी और अंगुलियाँ और वजूद | 
बिना वक्त की बंदिश के 
देखना पनपेगा फिर इक पेड़  तुम्हारी तरहां 
कि साये की मौत कभी नही होती | 

11 टिप्‍पणियां:

  1. भावनाओं की जो अकूत सम्पदा
    उकेर गये हो कैनवास पर
    हे चित्रकार !
    कौन कहता है तुम विलुप्त हो गए हो
    परिदृश्य से |

    बहुत सुंदर और सटीक. हुसैन का इस दुनिया से अलविदा कहना हरेक कलाप्रेमी को कचोटता रहेगा.

    मेरा भी हुसैन को नमन.

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  2. चित्रों को शब्द में व्यक्त करना कठिन है, पता नहीं चित्र कितना कहना चाहते हैं।

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  3. raaj maqbool fida husain ko aapne shiddat se yaad kiya . ek chitrakaar ki guru ko yah sachchi shradhamjali hai .shabdon men aapkee bhaawnaaon ka namak bharpoor moujood hai
    us kalaakar ko mera bhi salaam .

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  4. कलाकार कभी मरते नहीं हैं ... श्रधांजलि है ..

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  5. राज जी

    आपके चित्रकार से कभी रूबरू कराएं तो आभार मानूंगा …

    आपके ब्लॉग पर आपके बनाए चित्र हों तो लिंक दें कृपया

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  6. सृजन हमेशा किसी न किसी रूप में
    अमर रहता है !
    आभार मेरे ब्लॉग पर आने के लिये !

    उत्तर देंहटाएं
  7. आने वाले वक्त में
    ये लकीरें रहबर बनेंगीं
    तराशेंगी और अंगुलियाँ और वजूद |
    बिना वक्त की बंदिश के
    देखना पनपेगा फिर इक पेड़ तुम्हारी तरहां
    कि साये की मौत कभी नही होती |


    संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  8. mitro
    mere pita hmesha khte the ki insan ko jb bhi yad kro to uski achchhaiyo ke liye . uski buraiyo ka lekhjokha khi our hota hai our dnd bhi vhi nirdharit hota hai .
    abhi hal hi me digvnt huye mkbool fida husain saheb ko vivadaspd klakar manne ke bavjood kla ke kshetr me unke diye gye yogdan se muh nhi fera ja skta hai . meri ye kvita ek klakar ko kla ke kshetr me diye gye abhootpoorv yogdan ke prinam swroop gi gai shrdhanjli hai .
    aap sbhi ka bhut bhut dhnywaad .
    rajenr ji maine apne blog pr apni bnai koi kriti[chitr ] nhi dali hai

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  9. मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद... बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति ...आभार...
    सादर,
    डोरोथी.

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