रखदो चटके शीशे के आगे मन का कोई खूबसूरत कोना ,यह कोना हर एक टुकड़े में नज़र आये गा |

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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

धोखा



मै धागे का एक सिरा पकड़
फिर उस पर चल कर
तुम तक पह्चूं
ये जानने के लिए कि तुम कौन हो
जो मेरे ख्वाबो  में आ कर अदृश्य संदेश भेजते हो ,
स्पर्श को महसूस कराते हो ,
सोंधी खुश्बू वाली रोटी खिलाते हो
 सर्द रातों में लिहाफ उढ़ाते हो ,
गर्म रातों में बेना झुलाते हो |
जब मै धागे के बीचोबीच पहुंची
तो महसूस किया कि
धागा ढीला हो रहा है ,
लपलपा रहा है |
तुम्हारे सिरे से कुछ सरकता हुआ आ रहा है |
अरे !   ये तो अमूर्त धोखा है जो मुझसे टकरा कर ,
मुझे खाई में गिराने को आतुर है |
मैंने उसी क्षण अपने बढ़ते कदम
वापस कर लिए |
धागा फिर तन गया
और वो अमूर्त धोखा
मेरे सिरे पर वर्जित क्षेत्र का बोर्ड देख
अवाक्   वहीं ठहर  गया |
इस तरहां
 मैंने अपने आप को
ख्वाबों में भी
तुम्हारे बुने जाल से मुक्त कर लिया |